Friday, September 11, 2020

Jharkhand GK -8

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Thursday, September 10, 2020

Jharkhand GK Test No -7

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Tuesday, September 8, 2020

Jharkhand GK Quiz - 6

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Sunday, September 6, 2020

Jharkhand GK Quiz -5

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Thursday, September 3, 2020

Jharkhand Quiz -3 In hindi

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Wednesday, September 2, 2020

Jharkhand Quiz -2 In hindi

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jharkhand GK Quiz -1 Free (jharkhand GK in hindi )

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karam Puja (करम पूजा)

 




करम झारखण्ड और छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख त्यौहार है। मुख्य रूप से यह त्यौहार भादो (लगभग सितम्बर) मास की एकादशी के दिन और कुछेक स्थानों पर उसी के आसपास मनाया जाता है। इस मौके पर लोग प्रकृति की पूजा कर अच्छे फसल की कामना करते हैं, साथ ही बहनें अपने भाइयों की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करती हैं। करमा पर झारखंड के लोग ढोल और मांदर की थाप पर झूमते-गाते हैं। कर्मा को आदिवासी संस्कृति का प्रतीक भी माना जाता है।


कर्मा पूजा पर्व आदिवासी समाज का प्रचलित लोक पर्व है। इस त्यवहार में एक विशेष नृत्य किया जाता है जिसे कर्मा नृत्य कहते हैं । यह पर्व हिन्दू पंचांग के भादों मास की एकादशी को झारखण्ड, छत्तीसगढ़, सहित देश विदेश में पुरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, इस अवसर पर श्रद्धालु उपवास के पश्चात करमवृक्ष का या उसके शाखा को घर के आंगन में रोपित करते है और दूसरे दिन कुल देवी-देवता को नवान्न देकर ही उसका उपभोग शुरू होता है। कर्मा नृत्य को नई फ़सल आने की खुशी में लोग नाच-गाकर मनाया जाता है।


कर्मा नृत्य छत्तीसगढ़ और झारखण्ड की लोक-संस्कृति का पर्याय भी है। छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के आदिवासी और ग़ैर-आदिवासी सभी इसे लोक मांगलिक नृत्य मानते हैं। कर्मा पूजा नृत्य, सतपुड़ा और विंध्य की पर्वत श्रेणियों के बीच सुदूर गावों में विशेष प्रचलित है। शहडोल, मंडला के गोंड और बैगा एवं बालाघाट और सिवनी के कोरकू तथा परधान जातियाँ कर्मा के ही कई रूपों को आधार बना कर नाचती हैं। बैगा कर्मा, गोंड़ कर्मा और भुंइयाँ कर्मा आदि वासीय नृत्य माना जाता है। छत्तीसगढ़ के लोक नृत्य में ‘करमसेनी देवी’ का अवतार गोंड के घर में हुआ ऐसा माना गया है, एक अन्य गीत में घसिया के घर में माना गया है।


यह दिन इनके लिए प्रकृति की पूजा का है। ऐसे में ये सभी उल्लास से भरे होते हैं। परम्परा के मुताबिक, खेतों में बोई गई फसलें बर्बाद न हों, इसलिए प्रकृति की पूजा की जाती है। इस मौके पर एक बर्तन में बालू भरकर उसे बहुत ही कलात्मक तरीके से सजाया जाता है। पर्व शुरू होने के कुछ दिनों पहले उसमें जौ डाल दिए जाते हैं, इसे 'जावा' कहा जाता है। यही जावा बहनें अपने बालों में गूंथकर झूमती-नाचती हैं। बहनें अपने भाइयों की सलामती के लिए इस दिन व्रत रखती हैं। इनके भाई 'करम' वृक्ष की डाल लेकर घर के आंगन या खेतों में गाड़ते हैं। इसे वे प्रकृति के आराध्य देव मानकर पूजा करते हैं। पूजा समाप्त होने के बाद वे इस डाल को पूरे धार्मिक रीति‍ से तालाब, पोखर, नदी आदि में विसर्जित कर देते हैं।


उपवास

कर्मा की मनौती मानने वाले दिन भर उपवास रख कर अपने सगे-सम्बंधियों व अड़ोस पड़ोसियों को निमंत्रण देता है तथा शाम को कर्मा वृक्ष की पूजा कर टँगिये कुल्हारी के एक ही वार से कर्मा वृक्ष के डाल को काटा दिया जाता है और उसे ज़मीन पर गिरने नहीं दिया जाता। तदोपरांत उस डाल को अखरा में गाड़कर स्त्री-पुरुष बच्चे रात भर नृत्य करते हुए उत्सव मानते  हैं और सुबह पास के किसी नदी में विसर्जित कर दिया जाता हैं। इस अवसर पर एक विशेष  गीत भी गाये जाते हैं-


उठ उठ करमसेनी, पाही गिस विहान हो।

चल चल जाबो अब गंगा असनांद हो।।

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राजकीय चिन्ह के कुछ महत्वपूर्ण जानकारी आगामी झारखण्ड के प्रतियोगिता परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण : 

विर्ताकर : यह झारखण्ड के विकाश का प्रतीक है |


हरा रंग : यह हरियाली का प्रतीक है जो झारखण्ड के जंगलो और हरियाली को दर्शाता है इसके साथ-२ हरा खुशहाली तथा बेहतर पर्यावरण का प्रतीक है|


पलाश का फुल (24) : राजकीय फुल है तथा लाल रंग आग और क्रांति का प्रतीक है जो बताता है की झारखण्ड के लोगो में संघर्ष करने की क्षमता है तथा फुल के निचे काला रंग झारखंड के धरती में कोयला तथा खनिज का प्रतीक है | 


हाथी(24) : राजकीय पशु है तथा यह झारखण्ड के असली ताकत और अनुशाशन को दर्शाता  है |


नृत्य जोड़ा (24) :जनजातीयकला : श्रमिक ,किसानो ,नृत्य शैली ,सामूहिक नृत्य,संगीत,श्रम शक्ति, जनजातीय संस्कृति को दर्शाता है| 


अशोक स्तम्भ :राष्ट्रिय चिन्ह , यह बताता है की देश के विकाश में झारखण्ड कदम से कदम मिला कर चलने वाला राज्य है |


इसके अलावा अगर कोई जाकारी है तो कमेंट कर के बताएं

किशोर 🙏

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